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  • कार्य और कारण Kaarya Aur Kaaran WORK AND REASON

                  कार्य और कारण

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              WORK AND REASON 

        1.कार्य के लिए कारण का होना अनिवार्य :- 

    कार्य और कारण का अर्थ बहुत ही सरल है,  कार्य का मतलब काम और कारण का मतलब वजह है ;लेकिन इन दोनों शब्दों में बहुत ही घनिष्ठता है क्योंकि एक दूसरे के बिना किसी का भी अस्तित्व नहीं है । अभिप्राय यह है कि कार्य  और कारण में बहुत ही घनिष्ठता है क्योंकि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता है अर्थात् किसी कार्य के होने के लिए या कार्य को करने के लिए उस कार्य का कारण होना अति आवश्यक है इसीलिए बिना कारण के कार्य नहीं होता है । अतः कार्य करने के लिए कारण का होना अनिवार्य है ।  

             2.कार्य और कारण  में घनिष्ठता :- 

    इस वाक्य को मजदूर के उदाहरण से समझते हैं। कोई मजदूर मजदूरी इसलिए करता है क्योंकि मजदूरी करने से ही उसका जीवन यापन होता है । मजदूरी करना एक कार्य है और मजदूरी करने का कारण मजदूर  का जीवन यापन करना है । यदि जीवन यापन करना कारण नहीं होता तो मजदूर मजदूरी नहीं  करता ।  मजदूरी करने से ही मजदूर का जीवन यापन होता है इसलिए वह मजदूरी करता है ।

    यदि मजदूर का जीवनयापन मजदूरी करने से नहीं होता है तो वह मजदूरी नहीं करता इससे, यह स्पष्ट हुआ कि मजदूर मजदूरी इसलिए करता है क्योंकि मजदूरी से उसका जीवन- यापन होता है अतः इस उदाहरण से स्पष्ट हुआ कि कार्य और कारण में घनिष्ठ संबंध होता है । 

             3.कारण के बिना कार्य नहीं होता:-  

    कारण के बिना कार्य नहीं होता है और कार्य, कारण से ही होता है; बिना कारण के नहीं । मजदूर के उदाहरण में मजदूरी  करना कार्य है और जीवन यापन करना कारण है अतः इस उदाहरण से स्पष्ट है कि कार्य और कारण में घनिष्ठता होती है । कार्य के बिना कारण नहीं होता है और  बिना कारण के कार्य भी नहीं होता है ।

    कार्य और कारण के संबंध में एक मशहूर कहावत है-- "आग लगती है, तो ही धुआँ  निकलता है ।" यह कहावत  कार्य और कारण के संबंध में बिल्कुल उपयुक्त है । कहीं आग लगती है, तो धुआ तो उड़ता ही है । इसको  कार्य और कारण के विषय में समझते हैं कि आग लगने पर धुआँ उठा ।

    इसकी व्याख्या यह है कि आग लगी अर्थात् कारण हुआ । कारण हुआ तो धुआँ निकला अर्थात् कारण के होने पर ही कार्य हुआ है । आग लगी तो धुआँ उठा, यदि आग नहीं लगती तो धुआँ नहीं उठता अर्थात् आग लगना "कारण" है और धुआँ उठना "कार्य" है  स्पष्ट है कि  कारण के होने से ही कार्य हुआ है । 

    4. कार्य और कारण में पूर्ण पारस्परिक निर्भरता 

    कार्य और कारण में पूरी तरह से पारस्परिक निर्भरता होती है । इस वाक्य का अर्थ यह है कि कार्य और कारण एक दूसरे पर पूर्णतः  निर्भर होते हैं  । पहले के बिना दूसरे का कार्य नहीं  चलता है और दूसरे के बिना पहले का काम नहीं चलता । आशय यह है कि कार्य के बिना कारण नहीं होता है और कारण के बिना भी कार्य नहीं होता है अतः कार्य और कारण, दोनों एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर होते है।

     मजदूर के उदाहरण में हमने समझा कि मजदूर अपना जीवन यापन करने के लिए मजदूरी करता है मजदूरी करना ''कार्य" हैं और जीवन यापन करना "कारण" है, स्पष्ट है कि मजदूरी करना और जीवनयापन करना एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर है क्योंकि मजदूरी किए बिना मजदूर का जीवन यापन सकुशल संभव नहीं है ।

     जिस प्रकार मजदूर और मजदूरी एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर है उसी प्रकार कार्य और कारण भी एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर है । जिस प्रकार मजदूर का मजदूरी के बिना कार्य नहीं चलता है उसी प्रकार कार्य का कारण के बिना कार्य नहीं चलता है क्योंकि कार्य और कारण में पारस्परिक निर्भरता होती है ।  

      5. कार्य और कारण पति और पत्नी के समान    द्विपक्षीय एवं पूर्ण 

    कार्य और कारण द्विपक्षीय होते हैं ।  द्विपक्षीय अर्थात् दो पक्षों वाला या दो भागों वाला । जिस प्रकार द्विपक्ष में दो पक्षों का होना अनिवार्य होता है तो ही वह द्विपक्षीय कहलाता है ,   अन्यथा नहीं । इसी प्रकार कार्य और कारण भी  द्विपक्षीय है इसका अर्थ यह है कि एक पक्ष "कार्य"  दूसरा पक्ष "कारण" ।

    कार्य और कारण में भी दो पक्ष का होना अनिवार्य है, इसके अभाव में कार्य और कारण का अस्तित्व नहीं होता है। जिस प्रकार पति और पत्नी के जोड़े में द्विपक्ष होता हैं । उसी प्रकार कार्य और कारण भी में भी द्विपक्ष होता है 

    जिस प्रकार पति और पत्नी एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं,   उसी प्रकार कार्य और कारण भी एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं । पति और पत्नी के दोनों के होने पर ही पूर्णता होती है, उसी प्रकार कार्य और कारण दोनों के होने पर ही पूर्णता होती है अतः कार्य और कारण की तुलना  पति और पत्नी से करना कोई अनुचित नहीं है, ना ही कोई अतिशयोक्ति पूर्ण है।

    जिस प्रकार पति और पत्नी की पूर्णता जोड़े से ही होती है उसी प्रकार कार्य और कारण के जोड़े से ही पूर्णता होती हैं। यदि इन दोनों जोड़ों को अलग-अलग कर दिया जाए तो पूर्णता का सवाल ही नहीं आता है । अलग-अलग करने से वे अपूर्ण हो जाते हैं । इन दोनों का जोड़ा ही दोनों को पूर्णता प्रदान करता है, अतः कार्य और कारण पति और पत्नी के समान पूर्ण है तथा पति-पत्नी के समान द्विपक्षीय भी है ।

     

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